भारतीय समाज के कुटीर उद्योगों का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन

7 Apr

Authors: निशा, डॉ. शिवराम सिंह

Abstract: यह अध्ययन भारतीय समाज के कुटीर उद्योगों का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण प्रस्तुत करता है। कुटीर उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की पारंपरिक तथा श्रमप्रधान संरचना का महत्वपूर्ण अंग रहे हैं, जो ग्रामीण रोजगार सृजन, आत्मनिर्भरता, कौशल संरक्षण तथा सामाजिक-आर्थिक सशक्तिकरण में उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। वैश्वीकरण, उदारीकरण तथा तकनीकी प्रगति के परिणामस्वरूप भारतीय कुटीर उद्योगों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच के नए अवसर प्राप्त हुए हैं। इस अध्ययन में हथकरघा, हस्तशिल्प, खादी, कुटीर आधारित चिकित्सा, खाद्य प्रसंस्करण तथा अन्य पारंपरिक उद्योगों की वैश्विक मांग, निर्यात संभावनाओं, नीतिगत समर्थन तथा संस्थागत ढाँचे का मूल्यांकन किया गया है। साथ ही, सतत विकास, डिजिटल विपणन, कौशल उन्नयन तथा सरकारी योजनाओं के माध्यम से भारतीय कुटीर उद्योग वैश्विक अर्थव्यवस्था में अपनी सुदृढ़ पहचान स्थापित कर सकते हैं। अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुँच, ई-कॉमर्स, निर्यात विस्तार तथा वैश्विक गुणवत्ता मानकों को अपनाना इन उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान करता है, जबकि पूंजी की कमी, प्रतिस्पर्धा, आधुनिक तकनीक का अभाव तथा विपणन संबंधी समस्याएँ प्रमुख चुनौतियाँ बनी हुई हैं। अतः भारतीय कुटीर उद्योग न केवल राष्ट्रीय स्तर पर, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी सतत विकास एवं समावेशी आर्थिक प्रगति में महत्वपूर्ण योगदान देने की क्षमता रखते हैं।

DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19449451