Authors: डॉ. अजय कुमार
Abstract: िततमान समय में िैश्वीकरण का बोलबाला ै । य समय तकनीक का समय , हजसमें नए-नए प्रयोग प्रत्येक स्तर पर ो र े ैं । िैश्वीकरण के दौर में ह िं दी कहिता ने नए अनुभिोिं, सिंिेदनाओिं और सामाहजक यथाथत को अहभव्यक्त करने का म त्वपूणत कायत हकया ै । िैश्वीकरण ने दुहनया को एक गााँि की तर जोड़ हदया ै, हजससे आहथतक, सािंस्कृ हतक और सामाहजक स्तर पर व्यापक पररिततन हुए ैं । इन पररिततनोिं का प्रभाि ह िं दी कहिता पर भी स्पष्ट रूप से हदखाई देता ै । समकालीन ह िं दी कहियोिं ने िैश्वीकरण के कारण उत्पन्न उपभोक्तािाद, बाजारिाद, सािंस्कृ हतक सिंकट, हिस्थापन और असमानता जैसे हिषयोिं को अपनी कहिताओिं में प्रमुखता से उठाया ै । आज की ह िं दी कहिता के िल भािनात्मक अहभव्यक्तक्त तक सीहमत न ीिं ै, बक्ति ि सामाहजक चेतना और प्रहतरोध का माध्यम भी बन गई ै । कहि आम आदमी के जीिन में आए बदलािोिं, उसकी पीड़ा, सिंघषत और आशाओिं को अपनी रचनाओिं के माध्यम से व्यक्त करते ैं । िैश्वीकरण के प्रभाि से भाषा और शैली में भी पररिततन देखने को हमलता ै । नई पीढी के कहि पारिंपररक प्रतीकोिं के साथ-साथ आधुहनक जीिन के प ् रतीकोिं—जैसे बाजार, मीहडया, तकनीक, इिंटरनेट और म ानगरीय जीिन को भी अपनी कहिता का ह स्सा बना र े ैं । इससे ह िं दी कहिता का दायरा और व ् यापक हुआ ै । इसके साथ ी िैश्वीकरण ने सािंस्कृ हतक हिहिधता के सिंरक्षण की चुनौती भी पैदा की ै । ह िं दी कहिता इस चुनौती का सामना करते हुए स ्थानीयता, लोकजीिन और भारतीय सािंस्कृ हतक मूल्ोिं को भी अहभव्यक्त करती ै । इस प्रकार ह िं दी कहिता िैहश्वक और स्थानीय दोनोिं स्तरोिं के अनुभिोिं को समेटने का प्रयास करती ै । िैश्वीकरण के दौर में ह िं दी कहिता ने बदलते समय की जहटलताओिं को सिंिेदनशीलता के साथ व्यक्त हकया ै । य कहिता न के िल सामाहजक यथाथत का दपतण ै, बक्ति मानि मूल्ोिं और सािंस्कृ हतक अक्तिता को बचाने का सशक्त माध्यम भी ै ।