Authors: डॉक्टर अंशु सत्यार्थी
Abstract: हमारे भक्ति साहित्य में कृष्ण भक्ति काव्य की परंपरा बहुत समृद्ध और प्रभावशाली है। इस परंपरा में बहुत से कवियों ने भगवान श्री कृष्ण के विभिन्न रूपों और बाल लीलाओं का सजीव चित्रण किया है। भगवान और भक्ति का संबंध का मानवीय और भावात्मक रूप ही कृष्ण भक्ति के काव्य की प्रमुख विशेषता रही है। कृष्ण भक्ति में वात्सल्य और प्रेम के विविध रूप दृष्टिगत होते हैं। भक्ति काल के श्रेष्ठतम कवि महात्मा सूरदास ने अपने काव्य में वात्सल्य और प्रेम जैसे भावों का अत्यंत मार्मिक और मनमोहन चित्रण किया है। सूर का काव्य बालकृष्ण और मां यशोदा के संबंधों से वात्सल्य भाव की उत्कृष्ट अभिव्यक्ति को दर्शाता है वहीं दूसरी ओर गोपिकाओं और कृष्ण के सुमधुर संबंधों के द्वारा प्रेम के भाव की गहनता को भी प्रकट करता है। प्रस्तुत शोध पत्र में कृष्ण भक्ति काव्य की परंपरा का संक्षिप्त विवरण देकर सूरदास के काव्य में वर्णित वात्सल्य और प्रेम के स्वरूप का विश्लेषण किया गया है। इसके अध्ययन से यह स्पष्ट होगा कि सूरदास का काव्य केवल धार्मिक अनुभूति तक ही सीमित नहीं है अपितु यह भारतीय संस्कृति और मानवीय संवेदनाओं के गहरे प्रतिकों भी अपने में समेटे हुए है।