Authors: राहुल कुमार, डॉ. राकेश कुमार जायसवाल
Abstract: शासन की दो प्रमुख प्रणालियाँ प्रचलित हैं— एकात्मक शासन तथा संघात्मक शासन। इनका वर्गीकरण शक्तियों के केन्द्र और राज्यों के मध्य विभाजन के आधार पर किया जाता है। भारतीय संविधान में संघात्मक शासन प्रणाली को अपनाया गया है, यद्यपि यह पूर्णतः आदर्श संघवाद का रूप नहीं है। भारतीय संविधान में केन्द्र सरकार को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, साथ ही राज्यों को भी पर्याप्त अधिकार दिए गए हैं। वर्तमान समय में केन्द्र एवं राज्यों के मध्य अधिकारों के प्रयोग तथा उनके अतिक्रमण को लेकर टकराव की स्थिति उभरती दिखाई दे रही है। इसका प्रमुख कारण संसाधनों एवं शक्तियों के वितरण को लेकर उत्पन्न मतभेद हैं। राज्य सरकारें यह आरोप लगाती रही हैं कि केन्द्र सरकार उनके स्वायत्त अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप कर रही है, जबकि केन्द्र सरकार राष्ट्रीय हित एवं राष्ट्रीय योजनाओं को प्राथमिकता देते हुए अपने दायित्वों का निर्वहन करने का पक्ष प्रस्तुत करती है। विशेष रूप से वस्तु एवं सेवा कर (GST) प्रणाली लागू होने के पश्चात अनेक राज्यों द्वारा वित्तीय स्वायत्तता में कमी के आरोप लगाए गए हैं। इसी प्रकार, वर्तमान परिदृश्य में राज्यपाल की भूमिका को लेकर भी कई राज्यों ने प्रश्न उठाए हैं। आरोप लगाया जाता है कि राज्यपाल केन्द्र सरकार के प्रभाव में कार्य कर रहे हैं। कुछ राज्यों के मुख्यमंत्रियों द्वारा राज्यपाल के अभिभाषण के कुछ अंशों को न पढ़ने जैसे विवाद भी सामने आए हैं। विभिन्न राजनीतिक दलों की विचारधारात्मक भिन्नता के कारण केन्द्र-राज्य संबंधों में तनाव की स्थिति दिखाई देती है, जिसका प्रभाव प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ता है। कुछ राज्यों द्वारा केन्द्रीय एजेंसियों के दुरुपयोग के आरोप भी लगाए गए हैं। भारतीय संघवाद की मूल विशेषता सहकारी संघवाद है, जिसमें केन्द्र और राज्यों के बीच समन्वय, संवाद तथा सहयोग आवश्यक माना गया है। वर्तमान चुनौतियों के समाधान हेतु केन्द्र एवं राज्य सरकारों को बेहतर संवाद, पारस्परिक सहयोग तथा संवैधानिक मूल्यों के पालन के माध्यम से संघीय व्यवस्था को सुदृढ़ बनाना चाहिए। इससे केन्द्र-राज्य संबंधों में संतुलन स्थापित होगा तथा लोकतांत्रिक शासन प्रणाली अधिक प्रभावी एवं स्थिर बन सकेगी।
DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19449737