भारत में लैंगिक समानता और न्याय: नारीवादी विमर्श एवं समावेशी दृष्टिकोण

10 Apr

Authors: सोनू कुमार

Abstract: लैंगिक समानता और न्याय आधुनिक लोकतांत्रिक समाज की मूलभूत शर्तें हैं। भारतीय संविधान समानता, स्वतंत्रता और न्याय के आदर्शों को स्वीकार करता है, किंतु व्यावहारिक स्तर पर लैंगिक असमानता आज भी सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं में गहराई से विद्यमान है। यह शोध भारत में लैंगिक समानता और न्याय की स्थिति का विश्लेषण नारीवादी विमर्श तथा समावेशी दृष्टिकोण के आलोक में करता है। नारीवादी चिंतन ने लैंगिक असमानता को केवल जैविक भिन्नता का परिणाम न मानकर सामाजिक, सांस्कृतिक और पितृसत्तात्मक संरचनाओं की उपज के रूप में समझाया है। इस अध्ययन में उदारवादी, समाजवादी और दलित नारीवाद सहित विभिन्न नारीवादी दृष्टिकोणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया गया है कि लैंगिक न्याय केवल महिलाओं के अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ट्रांसजेंडर, हाशिए पर स्थित वर्गों और विविध लैंगिक पहचानों का समावेश भी आवश्यक है। शोध में यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि यद्यपि भारत में शिक्षा, रोजगार, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और कानूनी संरक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है, फिर भी लैंगिक हिंसा, वेतन असमानता, देखभाल श्रम की उपेक्षा और सामाजिक रूढ़ियाँ समानता के मार्ग में प्रमुख बाधाएँ बनी हुई हैं। समावेशी दृष्टिकोण इस तथ्य पर बल देता है कि लैंगिक न्याय तब तक पूर्ण नहीं हो सकता, जब तक नीतियां और संस्थाएं सभी लैंगिक पहचानों और सामाजिक समूहों को समान अवसर प्रदान न करें। अंततः यह शोध निष्कर्ष निकालता है कि भारत में वास्तविक लैंगिक समानता और न्याय की स्थापना के लिए संवैधानिक प्रावधानों के साथ-साथ नारीवादी चेतना, सामाजिक संवेदनशीलता और समावेशी नीतिगत हस्तक्षेप अनिवार्य हैं। यह अध्ययन समकालीन भारत में लैंगिक न्याय की बहस को एक व्यापक और बहुआयामी दृष्टिकोण प्रदान करता है।

DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19500250