Authors: विभा सिंह
Abstract: वर्तमान परिप्रेक्ष्य में पर्यावरण एक ऐसा मुद्दा है जिसने संपूर्ण विश्व को एक मंच पर एकत्रित कर दिया है, विगत दशकों में वैज्ञानिक खोजों एवं तकनीकी विकास ने एक तरफ मानव के कार्य को सरल बनाया वहीं दूसरी तरफ हमारे पर्यावरण को नकारात्मक रूप में प्रभावित किया है,जैसे- ओजोन परत(O2) का क्षरण,कार्बन डाइऑक्साइड (CO2) का उत्सर्जन, हरितगृह प्रभाव, जलवायु परिवर्तन आदि। वैज्ञानिक एवं तकनीकी विकास की यह आति एवं अंधाधुन दौड़ कहीं ना कहीं आने वाले समय के लिए बड़ा संकट है,तथा इस पर रोक लगाने हेतु वैश्विक एवं राष्ट्रीय स्तर पर सरकार द्वारा प्रयास किए गए हैं। तकनीकी विकास की लंबी दूरी तय करने के उपरान्त यह पाया गया है कि बिना व्यक्ति के चेतना एवं संवेदना के विकास के तकनीकी एवं वैज्ञानिकता का विकास लाभकारी नहीं हो सकता है, क्योंकि संवेदना एवं आंतरिक उत्थान के अभाव में व्यक्ति पर्यावरण संतुलन, सामंजस्य की अनिवार्यता और उसके महत्त्व को नहीं समझ सकता।