Authors: प्रशांत कुमार शोधार्थी
Abstract: ग्राम पंचायत की अवधारणा प्राचीन काल से ही विकसित होती रही है। चोल साम्राज्य को स्थानीय स्वशासन की विशिष्ट व्यवस्था के रूप में जाना जाता है, जिसे ग्राम पंचायत प्रणाली का प्रारम्भिक आधार माना जाता है। मध्यकाल से आधुनिक काल तक आते-आते राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज के सपनों को साकार करने हेतु भारतीय संविधान में राज्य के नीति-निदेशक तत्वों के अंतर्गत पंचायत व्यवस्था का प्रावधान किया गया, क्योंकि लोकतंत्र का मूल आधार स्थानीय स्वशासन ही है। ग्राम पंचायत लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण को सुदृढ़ करने के साथ-साथ नागरिकों की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक भागीदारी सुनिश्चित करती है। आधुनिक ग्राम पंचायतों के समक्ष अनेक संभावनाओं के साथ विभिन्न प्रकार की चुनौतियाँ भी विद्यमान हैं, जैसे— जनभागीदारी की कमी, प्रशासनिक जागरूकता एवं कार्यकुशलता का अभाव, प्रशिक्षित प्रतिनिधियों एवं कर्मचारियों की कमी, वित्तीय संसाधनों का अभाव तथा निर्भरता की समस्या। इन कारणों से निर्धारित लक्ष्यों की प्राप्ति एवं योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन में कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है।
DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19449579