Authors: शालू गुप्ता
Abstract: यह शोधपत्र भारतीय संदर्भ में लैंगिक भेदभाव की समस्या का विश्लेषण करता है। ‘लिंग’ से आशय उन सामाजिक और आर्थिक भूमिकाओं से है जो समाज पुरुषों और महिलाओं को प्रदान करता है। समाज किस प्रकार दोनों के बीच अंतर करता है और उनके लिए अलग-अलग अपेक्षाएँ और जिम्मेदारियाँ निर्धारित करता है, यही लिंग की अवधारणा को स्पष्ट करता है। यह विचार इसलिए विकसित हुआ ताकि महिलाओं की अधीन स्थिति को केवल जैविक कारणों से जोड़ने की प्रवृत्ति को चुनौती दी जा सके और यह समझा जा सके कि असमानता सामाजिक संरचना का परिणाम है। इस अध्ययन में भारत में व्याप्त लैंगिक असमानता की वर्तमान स्थिति उसके मूल कारणों तथा उसे दूर करने के संभावित उपायों पर चर्चा की गई है। भारतीय समाज के अनेक क्षेत्रों में पुरुषों के स्वास्थ्य और सशक्तिकरण को महिलाओं की तुलना में अधिक प्राथमिकता दी जाती है। यह असमानता जन्म के समय लिंगानुपात, शिशु एवं बाल मृत्यु दर में लिंग आधारित अंतर तथा महिलाओं के कम आयु में विवाह जैसे संकेतकों में स्पष्ट दिखाई देती है। इस शोध के मुख्य उद्देश्य हैं— विभिन्न राज्यों में लैंगिक भेदभाव की स्थिति का विश्लेषण करना, इसके कारणों और तथ्यों को समझना तथा भारत में इसे कम करने के लिए व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत करना। यह अध्ययन सैद्धांतिक प्रकृति का है और इसमें विभिन्न पुस्तकों, शोध-पत्रों, पत्रिकाओं, आवधिक प्रकाशनों तथा विश्वसनीय वेबसाइटों से प्राप्त द्वितीयक स्रोतों का उपयोग किया गया है जिनका उल्लेख संदर्भ सूची में किया गया है। परिवार स्तर पर महिलाओं के असशक्त होने के कारण उन्हें शिक्षा, रोजगार, आय, निर्णय लेने की स्वतंत्रता और आवागमन की स्वतंत्रता जैसे अवसरों तक सीमित पहुँच मिलती है। इन परिस्थितियों को देखते हुए भारतीय समाज के सामने यह बड़ी जिम्मेदारी है कि वह महिलाओं को सशक्त बनाए उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति सुनिश्चित करे और उन्हें सुरक्षित तथा सम्मानजनक भविष्य के लिए तैयार करे।
DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19449148