नाथ साहित्य और सामाजिक समरसता

11 Apr

Authors: डॉ. निशा साहू

Abstract: नाथ साहित्य हिंदी के आदिकालीन धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है जिसमें योगमार्ग, गुरु भक्ति और आत्मज्ञान की साधना को सर्वोच्च माना गया है। नाथ पंथ की उत्पत्ति सिद्ध मत की प्रतिक्रिया स्वरूप हुई है जिसमें भोग विलास, सामाजिक आडंबरों और बाह्याचारों का विरोध किया गया है। नाथ साहित्य का प्रमुख आधार योग साधना और आध्यात्मिक उन्नति है, हठयोग की प्रधानता है जो आत्मशुद्धि, संयम, ब्रह्मचर्य और मोक्ष की प्राप्ति की शिक्षा देता है। नाथ साहित्य ने भारतीय समाज में सामाजिक समानता, आध्यात्मिक जागृति और नैतिक पुनर्जागरण की भावना को जागृति किया है। नाथ संप्रदाय जाति, वर्ग, लिंग भेद से ऊपर उठकर सभी को समानता का अधिकार देता है। गोरखनाथ और अन्य नाथ योगियों ने समाज के निचले वर्गों को आध्यात्मिक मार्ग प्रदान किया जिससे सामाजिक समरसता को बढ़ावा मिला। नाथ साहित्य का दर्शन मानव को आंतरिक यात्रा और योगसाधना के माध्यम से आत्म बोध की ओर प्रेरित करता है। नाथ साहित्य ने आगे चलकर भक्ति आंदोलन और संत काव्य परंपरा की मजबूत नींव रखी जिसने हिंदी साहित्य के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19513173