पंचायती राज व्यवस्था का ऐतिहासिक और संवैधानिक पुनरावलोकन

11 Apr

Authors: प्रशांत कुमार

Abstract: भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार केवल संसदीय संस्थाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी जड़ें स्थानीय स्वशासन की परंपराओं में निहित रही हैं। पंचायती राज व्यवस्था भारतीय ग्रामीण जीवन की एक प्राचीन संस्था रही है, जिसका उद्देश्य जनसहभागिता, विकेंद्रीकरण एवं ग्रामीण विकास को सुनिश्चित करना है। स्वतंत्रता के पश्चात् पंचायती राज को सुदृढ़ बनाने के लिए विभिन्न समितियों की अनुशंसाओं के आधार पर संस्थागत सुधार किए गए। जिनमें विशेष रूप से 73वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 ने पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर लोकतंत्र को जमीनी स्तर तक सशक्त बनाया। यह शोध-पत्र पंचायती राज व्यवस्था के ऐतिहासिक विकास, संवैधानिक प्रावधानों, वर्तमान प्रासंगिकता तथा चुनौतियों का विश्लेषण प्रस्तुत करता है। अध्ययन में यह निष्कर्ष निकलता है कि पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र के विकेंद्रीकरण का सशक्त माध्यम है, किंतु वित्तीय स्वायत्तता, प्रशासनिक क्षमता और राजनीतिक हस्तक्षेप जैसी चुनौतियाँ इसके प्रभावी संचालन में बाधा उत्पन्न करती हैं।

DOI: https://doi.org/10.5281/zenodo.19513023