Authors: डॉ. शैलेन्द्र पाल सिंह
Abstract: हिन्दी लोक साहित्य भारत की सांस्कृतिक धरोहर का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपराओं के माध्यम से संप्रेषित सामूहिक स्मृति, सामाजिक मूल्यों तथा जीवनानुभवों को अभिव्यक्त करता है। समकालीन युग में वैश्वीकरण ने इन पारंपरिक रूपों की संरचना, संप्रेषण तथा सांस्कृतिक प्रासंगिकता को गहन रूप से प्रभावित किया है। प्रस्तुत अध्ययन वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी लोक साहित्य की भूमिका का परीक्षण उसके रूपांतरण, संरक्षण तथा अंतरराष्ट्रीय प्रसार के आधार पर करता है। इस शोध में गुणात्मक एवं व्याख्यात्मक पद्धति का अवलंबन किया गया है। साथ ही नव चयनित लोक साहित्यिक इकाइयों—लोकगीत, लोककथाएं, वीरगाथाएं, लोकोक्तियां तथा लोकनाट्य प्रस्तुतियों—का सांख्यिकीय सामग्री-विश्लेषण भी किया गया है। निष्कर्षों से ज्ञात होता है कि लोकगीत सर्वाधिक प्रभावी तथा अनुकूलनशील विधा के रूप में विद्यमान हैं, जबकि आधुनिक प्रौद्योगिकी आधारित संचार माध्यम संप्रेषण के प्रमुख साधन के रूप में उभरकर पारंपरिक मौखिक पद्धतियों का स्थान ग्रहण कर रहे हैं। विषय वस्तु-विश्लेषण से यह भी स्पष्ट होता है कि पारंपरिक ग्रामीण एवं अनुष्ठानिक विषयों के साथ-साथ स्त्री-अनुभव, प्रवास तथा सामाजिक परिवर्तन की अभिव्यक्ति में निरंतर वृद्धि हुई है। भाषिक संरचना में क्षेत्रीय बोलियों की निरंतर उपस्थिति के साथ मानक एवं मिश्रित भाषा-रूपों का विस्तार भी दृष्टिगोचर होता है। अध्ययन यह भी रेखांकित करता है कि वैश्वीकरण के कारण प्रवासी समुदायों, सांस्कृतिक आदान-प्रदान कार्यक्रमों, विश्वविद्यालयों तथा आधुनिक संचार मंचों के माध्यम से हिन्दी लोक साहित्य का वैश्विक स्तर पर प्रसार सुलभ हुआ है।