राजनीतिक चिन्तन, शासन और सार्वजनिक नीति

7 Apr

Authors: मोहित कुमार रस्तोगी\ Abstract: "सुशासन" प्रभावी लोकतान्त्रिक प्रशासन की आधारशिला है, जिसमें पारदर्शिता, जवाबदेही, उत्तरदायित्व और सहभागी निर्णय लेने के सिद्धान्त शामिल हैं। भारत में, "सुशासन" की खोज प्राचीन दार्शनिक आधारों से विकसित होकर समकालीन डिजिटल शासन पहलों तक … Read More »

हिंदी आलोचना के विविध रूप और विकास

7 Apr

Authors: डॉ अनीता सिंह Abstract: हिंदी की विभिन्न विधाओं की तरह आलोचना का विकास भी प्रमुख रूप से आधुनिक काल की देन है | किसी भी साहित्य के आलोचना के विकास की दो प्रमुख शर्त्तें हैं-पहली कि आलोचना रचनात्मक साहित्य … Read More »

भारतीय ज्ञान परंपरा और उसके मूल तत्व

7 Apr

Authors: डॉ. मंजूषा Abstract: भारतीय ज्ञान परंपरा (IKS) मिथक के पीछे छिपे सत्य को उजागर करने का एक सशक्त प्रयास है। IKS परंपरा से प्रमाण तक की ज्ञान यात्रा है तथा प्राचीन ज्ञान और आधुनिक सत्य का सेतु है। IKS … Read More »

माध्यमिक विद्यालय स्तर पर क्रिकेट एवं फुटबॉल खिलाड़ियों की चयनित शारीरिक दक्षताओं का तुलनात्मक विश्लेषण

7 Apr

Authors: आशीष यादव Abstract: खेल को जीवन का अभिन्न अंग माना जाता है तथा खिलाड़ी को" समाज का। खेल से जहाँ एक ओर शारीरिक, मानसिक तथा सामाजिक स्थिति में सुधार होता है, वहीं दूसरी ओर मानवीयता के गुण, सहयोग की … Read More »

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भाितीय ज्ञान पिंपिा: एकात्मता औि सतत श ् ववकास का एक वैकल्पिक मार्ग

7 Apr

Authors: अजय कुमार दूबे, प ् रो. (डॉ.) गीता िमाा Abstract: प ् रस्तुत शोध-पत्र भारतीय ज्ञाि परंपरा (IKS) की िैविक प्रासंवगकताओं का अन्वेषण करता है। ितामाि विि जब जलिायु पररिताि, मािवसक स्वास्थ्य और सामावजक विखंडि जैसे संकटों से जूझ … Read More »

वैश्वीकरण के दौर में ह िं दी कहवता

7 Apr

Authors: डॉ. अजय कुमार Abstract: िततमान समय में िैश्वीकरण का बोलबाला ै । य समय तकनीक का समय , हजसमें नए-नए प्रयोग प्रत्येक स्तर पर ो र े ैं । िैश्वीकरण के दौर में ह िं दी कहिता ने नए … Read More »

भारतीय समाज के कुटीर उद्योगों का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में अध्ययन

7 Apr

Authors: निशा, डॉ. शिवराम सिंह Abstract: यह अध्ययन भारतीय समाज के कुटीर उद्योगों का वैश्विक परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण प्रस्तुत करता है। कुटीर उद्योग भारतीय अर्थव्यवस्था की पारंपरिक तथा श्रमप्रधान संरचना का महत्वपूर्ण अंग रहे हैं, जो ग्रामीण रोजगार सृजन, आत्मनिर्भरता, … Read More »