शिवप्रसाद सिंह के कथा साहित्य में भारत बोध

11 Apr

Authors: Verender Pal Abstract: प्रस्तुत शोध-पत्र आधुनिक हिंदी कथा साहित्य के मूर्धन्य रचनाकार डॉ. शिवप्रसाद सिंह के सृजन संसार में अंतर्निहित 'भारत बोध' की अवधारणा को रेखांकित करने का एक प्रयास है। शिवप्रसाद सिंह का साहित्य केवल कथात्मक विन्यास नहीं … Read More »

नाथ साहित्य और सामाजिक समरसता

11 Apr

Authors: डॉ. निशा साहू Abstract: नाथ साहित्य हिंदी के आदिकालीन धार्मिक एवं दार्शनिक साहित्य में महत्वपूर्ण स्थान रखता है जिसमें योगमार्ग, गुरु भक्ति और आत्मज्ञान की साधना को सर्वोच्च माना गया है। नाथ पंथ की उत्पत्ति सिद्ध मत की प्रतिक्रिया … Read More »

महिलाओं के मौलिक अधिकार

11 Apr

Authors: प्रो. (डॉ.) सपना भारती (संस्कृत), श्री नवीन चन्देल (प्रधानाचार्य) Abstract: ‘महिला अधिकार’ का तात्पर्य उन सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और कानूनी अधिकारों से है जो महिलाओं को गरिमापूर्ण जीवन जीने के लिए आवश्यक हैं। महिलाएं समाज का आधा हिस्सा हैं। … Read More »

वैश्वीकरण के परिप्रेक्ष्य में हिन्दी लोक साहित्य की भूमिका

11 Apr

Authors: डॉ. शैलेन्द्र पाल सिंह Abstract: हिन्दी लोक साहित्य भारत की सांस्कृतिक धरोहर का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंग है, जो पीढ़ी दर पीढ़ी मौखिक परंपराओं के माध्यम से संप्रेषित सामूहिक स्मृति, सामाजिक मूल्यों तथा जीवनानुभवों को अभिव्यक्त करता है। समकालीन … Read More »

पंचायती राज व्यवस्था का ऐतिहासिक और संवैधानिक पुनरावलोकन

11 Apr

Authors: प्रशांत कुमार Abstract: भारतीय लोकतंत्र की सफलता का आधार केवल संसदीय संस्थाओं तक सीमित नहीं है बल्कि इसकी जड़ें स्थानीय स्वशासन की परंपराओं में निहित रही हैं। पंचायती राज व्यवस्था भारतीय ग्रामीण जीवन की एक प्राचीन संस्था रही है, … Read More »

भारतीय आहार संस्कृति में त्रिगुणों की भूमिका: भगवद्गीता का दृष्टिकोण

11 Apr

Authors: डॉ. दिवाकर पाल Abstract: भगवद्गीता भोजन को समझने के लिए एक अद्वितीय दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है, जिसे त्रिगुणों की संकल्पना के माध्यम से समझाया गया है – ये मूलभूत गुण हैं जो सम्पूर्ण सृष्टि में व्याप्त हैं। ये केवल … Read More »